भरोसा था उन पर, खुद से भी ज्यादा
चाहा था उनको,अपनों से ज्यादा!
किसकी भूल थी, समझ में न आया
रूठी है आज भी, मुझसे भी ज्यादा!
सुनी हैं बाहें, लिपटन को उनके
प्यासी है ओठ, चुम्बन को उनके!
होकर भी ज़िंदा, ज़िंदा नहीं हूँ
ना जाने अब, कहाँ मैं खड़ा हूँ!
चाहा था उनको,अपनों से ज्यादा!
किसकी भूल थी, समझ में न आया
रूठी है आज भी, मुझसे भी ज्यादा!
सुनी हैं बाहें, लिपटन को उनके
प्यासी है ओठ, चुम्बन को उनके!
होकर भी ज़िंदा, ज़िंदा नहीं हूँ
ना जाने अब, कहाँ मैं खड़ा हूँ!
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