न जाने कब खो गये उनकी मुहब्बत में हम,
न खुद की ख़बर थी न औरों की फिकर,
गुजर रहे थे जो लम्हे़ं हसीन ख्वाबों में,
पर शायद रब को मंजूर कुछ अौर ही था,
जब जागा उन हसीन ख्वाबों से मैं,
तब उनकी यादें तो थी पर मैं ख़ुद में न था....
न खुद की ख़बर थी न औरों की फिकर,
गुजर रहे थे जो लम्हे़ं हसीन ख्वाबों में,
पर शायद रब को मंजूर कुछ अौर ही था,
जब जागा उन हसीन ख्वाबों से मैं,
तब उनकी यादें तो थी पर मैं ख़ुद में न था....
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